एक समय की बात है। एक व्यक्ति था जो बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखता था, लेकिन भीतर से हर पल डर से भरा रहता था। उसे किसी एक चीज़ का नहीं, पूरी ज़िंदगी का डर था— बीमारी का डर, अपमान का डर, गरीबी का डर, और सबसे अधिक… मृत्यु का डर।
वह हर सुबह यह सोचकर उठता— “पता नहीं आज क्या बुरा होगा?” और हर रात इसी डर के साथ सो जाता— “अगर कल न उठा तो?”
असल में वह जी नहीं रहा था, बस साँसें गिन रहा था।
कई उपाय करने के बाद एक दिन वह एक सिद्ध संत के पास पहुँचा। चेहरे पर थकान थी, आँखों में चिंता, और आवाज़ में काँपता हुआ भय।
उसने कहा— “महाराज, सब कुछ होते हुए भी मन में शांति नहीं है। मृत्यु का भय मुझे चैन से जीने नहीं देता।”
संत कुछ देर उसे देखते रहे। फिर शांत स्वर में बोले— “मृत्यु से डरते हो, या अधूरे जीवन से?”
व्यक्ति यह प्रश्न समझ नहीं पाया।
संत उसे नदी के किनारे ले गए। तेज़ बहती धारा को दिखाकर बोले—“यह नदी हर क्षण मरती भी है और हर क्षण जन्म भी लेती है। पानी का हर कण आगे बढ़ते हुए पीछे को छोड़ देता है।
अगर नदी पीछे रुक जाए,तो सड़ जाएगी।”
फिर संत ने पास पड़ी एक सूखी पत्ती उठाई और कहा— “यह पत्ती मर गई क्योंकि इसने बहना छोड़ दिया। डर ने इसे जकड़ लिया।”
संत ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा— “मनुष्य भी तब मरता है, जब वह डर में रुक जाता है। और जीता है—जब स्वीकार कर आगे बढ़ता है।”
इसके बाद संत उसे श्मशान ले गए। वहाँ जलती चिताओं की ओर इशारा करके बोले—
“यहाँ सभी समान हैं— अमीर-गरीब, ज्ञानी-अज्ञानी। कोई भी मृत्यु को टाल नहीं सका। लेकिन सोचो— इनमें से कितनों ने जीवन को खुलकर जिया होगा?”
व्यक्ति की आँखें नम हो गईं।
संत ने धीरे से कहा— “मृत्यु जीवन की दुश्मन नहीं है,वह उसकी पूर्णता है। डर दुश्मन है,क्योंकि वह जीवन को मरने से पहले ही खत्म कर देता है।”
फिर संत ने अंतिम उपदेश दिया— “जो मृत्यु को याद रखकर जीता है, वह व्यर्थ की इच्छाओं से मुक्त हो जाता है। और जो जीवन को समझकर जीता है, वह मृत्यु से भी नहीं डरता।”
उस दिन उस व्यक्ति के भीतर कुछ टूट गया— डर का बंधन। और उसी दिन कुछ जन्मा— सचेत जीवन।
अब वह जान गया था— मरना एक घटना है,लेकिन डर में जीना एक रोज़ की मृत्यु।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीना सीखो। पूरी जागरूकता से, कृतज्ञता से, साहस से। क्योंकि मरना तो एक दिन होना ही है, लेकिन जीना—वह एक कला है।








