पुराने समय में एक राजा दान-पुण्य करने के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। रोज सुबह उसके महल के बाहर जरूरतमंदों की लंबी कतार लगती थी और राजा खुले मन से सबकी मदद करता था, लेकिन समय के साथ उसके मन में अपने अच्छे कार्यों का अहंकार भी आने लगा। उसे लगने लगा कि उससे बड़ा दानी इस दुनिया में कोई नहीं।
एक दिन एक संत उसके दरबार में आए। राजा ने बड़े गर्व से कहा, “गुरुदेव, आप जो चाहें मुझसे मांग सकते हैं। मैं आपकी हर इच्छा पूरी कर सकता हूं।”
संत समझ गए कि राजा को अपने दान का घमंड हो गया है। उन्होंने मुस्कुराते हुए अपना छोटा सा कमंडल आगे बढ़ाया और कहा, “राजन्, बस इस कमंडल को स्वर्ण मुद्राओं से भर दीजिए।”
राजा ने कमंडल को देखा और हंसते हुए कहा, “इतना छोटा सा काम? यह तो अभी पूरा कर देता हूं।” उसने तुरंत अपनी थैली से स्वर्ण मुद्राएं निकालकर कमंडल में डाल दीं, लेकिन जैसे ही मुद्राएं अंदर गईं, वे गायब हो गईं।
राजा को आश्चर्य हुआ। उसने कोषाध्यक्ष को बुलाकर और मुद्राएं मंगवाईं, लेकिन हर बार वही हुआ, जितनी भी मुद्राएं डाली गईं, सब गायब हो जातीं और कमंडल खाली का खाली रहता।
अब राजा परेशान हो गया। उसने अपना पूरा खजाना मंगवा लिया और लगातार मुद्राएं डालता रहा, लेकिन कमंडल नहीं भरा। अंततः थककर उसने संत के सामने हाथ जोड़ दिए और कहा, “गुरुदेव, कृपया इस रहस्य को बताइए। इतना धन डालने के बाद भी यह कमंडल क्यों नहीं भरता?”
संत ने शांत स्वर में कहा, “राजन्, यह कमंडल मन का प्रतीक है। जैसे यह कभी नहीं भरता, वैसे ही मन भी कभी संतुष्ट नहीं होता। धन, सुख-सुविधाएं, पद और ज्ञान, कुछ भी मन को पूरी तरह नहीं भर सकता। इच्छाएं हमेशा बढ़ती रहती हैं।”
राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने समझ लिया कि सच्ची शांति दान से नहीं, बल्कि अहंकार और इच्छाओं के त्याग से मिलती है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, मनुष्य की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं। जितना हम पाते हैं, उतना ही और पाने की चाह बढ़ती जाती है। इसलिए जरूरी है कि हम अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करें। संतुष्टि का अभ्यास करें, तभी मन शांत रहेगा।








