धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 888

गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ लगातार यात्रा करते थे। उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए कुछ खास नियम बनाए भी थे। बारिश के दिनों में वो एक स्थान पर लगभग ढाई महीने ठहर सकते थे। बाकी समय भिक्षुओं-संन्यासियों को दो दिन से ज्यादा कहीं रुकने की इजाजत नहीं थी। ताकि किसी एक परिवार पर उनका बोझ न पड़े। उस दौर में यात्रा अधिकतर जंगलों के रास्तों से होती थी, जो बारिश में कठिन और जोखिम भरे हो जाते थे।

एक बार बुद्ध और उनके शिष्य एक गांव में पहुंचे। वहां सभी अपने ठहरने की व्यवस्था ढूंढ रहे थे। तभी एक परम सुंदरी ने बुद्ध के शिष्य आनंद को अपने घर ठहरने के लिए आमंत्रित किया। आनंद ने विनम्रता से कहा कि वह रुक सकते हैं, लेकिन पहले उन्हें अपने गुरु गौतम बुद्ध से आज्ञा लेनी होगी।

स्त्री ने आश्चर्य के साथ पूछा कि क्या हर बात के लिए गुरु से अनुमति जरूरी है? आनंद ने उत्तर दिया कि वो जानते हैं कि बुद्ध मना नहीं करेंगे। फिर भी बिना पूछे ठहरना परंपरा के खिलाफ होगा। आनंद बुद्ध के पास पहुंचे और बोले कि गांव में एक स्त्री ने उन्हें अपने घर ठहराने के लिए आमंत्रित किया है, लेकिन वह वेश्या है। शिष्य ने पूछा कि क्या मुझे उसका निमंत्रण स्वीकार करना चाहिए।

बुद्ध मुस्कराए और बोले कि यदि उसने स्नेहपूर्वक बुलाया है तो उसके आग्रह को अस्वीकार मत करना। जाओ और वहीं विश्राम करो। बुद्ध की यह बात सुनकर अन्य शिष्य असहज हो गए। उन्होंने प्रश्न किया कि एक भिक्षु को वेश्या के घर भेजना परंपरा के खिलाफ नहीं होगा क्या? बुद्ध ने हल्के स्वर में कहा कि तीन दिन प्रतीक्षा करो, उत्तर स्वयं मिल जाएगा।

इसके बाद आनंद उस स्त्री के घर चले गए। इधर अन्य शिष्य उन पर नजर रखने लगे और जो कुछ देखते-सुनते, बुद्ध को बताते रहे। पहले दिन घर से गाने की ध्वनि सुनाई दी। शिष्यों ने सोचा आनंद मार्ग से भटक गए। दूसरे दिन गाने के साथ नृत्य की आवाजें भी सुनाई देने लगी। शिष्यों का संदेह और गहरा गया। तीसरे दिन उन्होंने खिड़की से आनंद और उस स्त्री को नाचते-गाते देख लिया। सभी को लगा कि आनंद अब भिक्षु जीवन छोड़ देंगे।

चौथे दिन सभी लोग बस्ती के चौक पर इकट्ठा हुए। अधिकांश शिष्यों को विश्वास था कि आनंद वापस नहीं आएंगे। तभी आनंद दूर से आते दिखाई दिए। उनके साथ वही स्त्री भी थी। लेकिन अब वह भिक्षुणी के वस्त्रों में थी। बुद्ध उसे देखकर मुस्कराए। तब बुद्ध ने आनंद की पीठ थपथपाई और कहा कि यदि मनुष्य को अपने चरित्र पर भरोसा हो तो कोई उसे गिरा नहीं सकता। बल्कि दृढ़ चरित्र वाला व्यक्ति दूसरों को भी सही राह पर ला सकता है।

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