धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 857

एक बार एक आश्रम में एक ज्ञानी संत रहते थे। उनका एक युवा शिष्य था जिसे कुछ बुरी आदतें लग गई थीं। जब भी संत उसे समझाते कि समय रहते इन्हें सुधार लो, तो वह लापरवाही से कहता, “गुरुजी, अभी तो यह बहुत नई आदत है, मैं इसे जब चाहूं छोड़ सकता हूं। बस कुछ दिन और, फिर छोड़ दूंगा।”

एक दिन संत ने उस शिष्य को अपने कमरे में बुलाया। संत के पास कुछ सूत (कच्चा धागा) और रस्सियां रखी हुई थीं।

संत ने शिष्य को एक बहुत ही बारीक, कच्चा धागा दिया और कहा, “बेटा, जरा इसे तोड़ कर दिखाओ।”
शिष्य ने मुस्कुराते हुए अपनी उंगलियों से उसे बिना किसी मेहनत के तुरंत तोड़ दिया।

इसके बाद संत ने वैसे ही कुछ धागों को एक साथ मिलाकर एक थोड़ी मोटी डोरी (सुतली) बनाई और शिष्य को तोड़ने के लिए दी। शिष्य ने इस बार अपने दोनों हाथों का इस्तेमाल किया, थोड़ा जोर लगाया और एक झटके में उसे भी तोड़ दिया।

अंत में, संत ने बहुत सारे धागों को आपस में गूंथ कर बनी एक काफी मोटी और मजबूत रस्सी उठाई— वैसी रस्सी जिससे बड़े-बड़े जानवरों या नावों को बांधा जाता है। उन्होंने वह रस्सी शिष्य के हाथों में दी और कहा, “अब अपनी पूरी ताकत लगाकर इसे तोड़ कर दिखाओ।”

शिष्य ने उस मोटी रस्सी को अपने हाथों में लपेटा और अपनी पूरी ताकत लगा दी। वह पसीने से भीग गया, उसकी नसें तन गईं, उसके हाथों में लाल निशान पड़ गए, लेकिन वह उस रस्सी का एक रेशा भी नहीं तोड़ पाया। हार मानकर वह हांफते हुए बोला, “गुरुजी, यह असंभव है! यह रस्सी इतनी मोटी और मजबूत हो चुकी है कि इसे कोई इंसान अपने हाथों से नहीं तोड़ सकता।”

तब संत ने गंभीरता से शिष्य की आंखों में देखा और कहा: “बेटा, हमारी बुरी आदतें भी बिल्कुल इन धागों की तरह ही होती हैं।”

संत ने आगे समझाया, “जब तुम पहली बार कोई गलती करते हो या कोई बुरी आदत अपनाते हो, तो वह उस एक कच्चे धागे की तरह होती है। उस वक्त उसे तोड़ना (छोड़ना) बहुत आसान होता है। लेकिन हर बार जब तुम उस आदत को दोहराते हो— यह सोचकर कि ‘कल छोड़ दूंगा’— तो तुम उस धागे के साथ एक नया धागा जोड़ रहे होते हो। लगातार दोहराए जाने पर, तुम्हारी वही छोटी सी आदत एक मोटी और मजबूत रस्सी बन जाती है, जो तुम्हें पूरी तरह जकड़ लेती है। फिर तुम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उससे आज़ाद नहीं हो पाते।”

शिष्य को अब गहराई से समझ आ गया था कि उसकी ‘कल छोड़ दूंगा’ की सोच उसे कितनी मजबूत जंजीरों में बांध रही है। उसने उसी दिन से अपनी उस आदत को छोड़ने का पक्का इरादा कर लिया।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, कोई भी आदत एक ही दिन में मजबूत नहीं होती। यह हमारे ही बार-बार किए गए व्यवहार का परिणाम होती है। इसलिए, इससे पहले कि आदत आपको अपना गुलाम बना ले, आपको उस आदत को छोड़ देना चाहिए।

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