धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 863

आकाश में दो उल्लू उड़ रहे थे। एक उल्लू के मुंह में सांप था और दूसरे उल्लू के मुंह में चूहा।
दोनों ही उल्लू अपने शिकार को लेकर ऊँचाई पर उड़ रहे थे। दोनों शिकार (सांप और चूहा) मौत के करीब थे, क्योंकि कुछ ही पलों में उल्लू उन्हें अपना आहार बनाने वाले थे। लेकिन मौत के इतने करीब होने के बावजूद सांप अपनी गर्दन घुमा-घुमा कर दूसरे उल्लू के मुंह में दबे चूहे को पकड़ने की कोशिश कर रहा था। वह खुद मौत की गिरफ्त में था, लेकिन उसका ‘लोभ’ खत्म नहीं हुआ था। उसे लग रहा था कि मरने से पहले एक और शिकार मिल जाए।

वहीं चूहा उल्लू के पंजे में दबा होने के बावजूद सांप से बचने की कोशिश कर रहा था। वह मौत के वास्तविक कारण (उल्लू) से नहीं, बल्कि अपनी ‘पुरानी आदत’ (डर) की वजह से सांप से घबरा रहा था।

सांप उस आदमी का प्रतीक है जो बुढ़ापे में, मौत की बिस्तर पर पड़ा होने के बावजूद यह सोचता है कि “थोड़ा धन और मिल जाए” या “वसीयत में कुछ और जुड़ जाए।” वह खुद काल के गाल में है, पर उसकी वासना अभी भी चूहे (सांसारिक सुख) को पकड़ने में लगी है।

चूहा उस आदमी का प्रतीक है जो पूरी उम्र काल्पनिक और छोटे डरों में जीता है। हमें पता है कि मौत (उल्लू) ने हमें पकड़ रखा है और वह किसी भी क्षण खत्म कर देगी, लेकिन हम अभी भी समाज, पड़ोसी या छोटे-मोटे नुकसान (सांप) से डरे हुए हैं।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “मनुष्य भी ऐसा ही है। काल ने उसे पकड़ रखा है, लेकिन वह अभी भी दूसरों की थाली का छेद देख रहा है (सांप की तरह) या उन चीजों से डर रहा है जो अब उसे मार भी नहीं सकतीं (चूहे की तरह)। जब तक आप जागते नहीं, आप भी इन्ही उल्लुओं के मुंह में दबे शिकार की तरह हैं।”

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