धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—882

एक छोटे से गांव में एक प्रसिद्ध संत रहते थे। उनके पास दूर-दूर से लोग अपनी समस्याएँ लेकर आते थे। संत हमेशा शांत, स्थिर और प्रसन्न दिखाई देते थे—चाहे परिस्थिति कैसी भी हो।

एक दिन एक युवक उनके पास आया। वह बहुत परेशान था। उसने कहा, “गुरुदेव, मेरे जीवन में लगातार समस्याएँ आ रही हैं। कभी धन की कमी, कभी रिश्तों में तनाव… मैं समझ नहीं पा रहा कि क्या करूँ। क्रोध और दुख मुझ पर हावी हो जाते हैं।”

संत मुस्कुराए और उसे पास बैठने को कहा।

संत ने एक जलता हुआ दीपक उसके सामने रखा और बोले, “इस दीपक को ध्यान से देखो।”

युवक ने देखा—दीपक शांत था, उसकी लौ स्थिर थी। तभी संत ने खिड़की खोल दी। हवा का तेज झोंका आया और दीपक की लौ डगमगाने लगी, कभी तेज, कभी धीमी।

संत बोले, “यह दीपक तुम्हारा मन है, और यह हवा जीवन की परिस्थितियाँ।”

युवक ध्यान से सुनने लगा।

संत ने आगे कहा, “जब तक हवा हल्की है, दीपक स्थिर रहता है। लेकिन जैसे ही तेज हवा आती है, वह हिलने लगता है। इसी तरह, जब जीवन में समस्याएँ आती हैं—गुस्सा, डर, दुख—ये सब ‘हवा’ की तरह तुम्हारे मन को हिलाते हैं।”

“लेकिन समझदार व्यक्ति क्या करता है?”
संत ने दीपक को एक कांच के आवरण से ढक दिया। अब हवा चलने के बावजूद दीपक शांत जलने लगा।

संत बोले, “यह कांच का आवरण है—तुम्हारा संयम और विवेक।”

“अगर तुम अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर सको, तो परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, तुम्हारा मन स्थिर रहेगा। और जब मन शांत होगा, तभी तुम सही निर्णय ले पाओगे।”

युवक की आँखों में समझ की चमक आ गई।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन में उतार-चढ़ाव आना स्वाभाविक है। भावनाओं के बहाव में बहकर निर्णय लेना अक्सर गलत होता है। संयम, धैर्य और शांत मन ही सही मार्ग दिखाते हैं।

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