एक पंडित को तीर लग गया था। बुद्ध पास से गुजरते हैं, तो उन्होंने कहा मैं यह तीर खींच दूं । उस पंडित ने कहा, पहले यह साफ हो कि यह तीर किसने मारा? मारने वाला मित्र या शत्रु है? प्रयोजन क्या है? अगर मैं मर जाऊंगा तो यह बुरा होगा, या मैं बच जाऊंगा तो वह बुरा होगा? मेरा बचना सुनिश्चित रूप से हितकर है, या मेरा मर जाना? जब तक यह तय न हो जाए तब तक तीर को कैसे निकालें? फिर यह तीर- जहर बुझा है कि नहीं बुझा हैं? यह नियति है या संयोग? यह मेरा भाग्य है या सिर्फ दुर्घटना हैं? यह सब साफ हो जाए, फिर ती को खींचे।
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तो बुद्ध ने कहा- यह साफ तो शायद कभी न हो पायेगा। एक बात साफ है कि साफ करने में तुम मिट जाओगे, मर जाओगे। लेकिन उस पंडित ने कहा, बिना सुनिश्चित किये कुछ कार्य करना उचित भी तो नहीं है।
अज्ञानी तीव्रता से चला जाता है अंधकार में भी। ज्ञानी को अगर प्रकाश भी दिखायी पड़े तो इतने रूपों में दिखायी पड़ता है कि खड़ा रह जाता है, चल नहीं पाता।
इसलिए दूसरा अर्थ मि समझ लें कि सुनिश्चित है, सुनिश्चिता का।
एक सुनिश्चय है अज्ञान का, अनिश्चय है ज्ञान का। फिर एक और सुनिश्चय है अनुभव का। और अनुभवी जब सुनिश्चत होता है, तब एक अर्थ में वह पुन: अज्ञानी जैसा सुनिश्चत हो जाता है।
रामकृष्ण के पास विवेकानंद जाते हैं तो रामकृष्ण बिलकुल सुनिश्चत है। विवेकांद पूछते हैं कि ईश्वर है? तो रामकृष्ण कहते हैं, यह बेकार की बात क्यूं करनी, तुझे मिलना है? यह उत्तर ज्ञानी के पास नहीं मिल सकता था। विवेकानंद ज्ञानी के पास भी गये थे। महर्षि देवेद्रनाथ के पास भी गये थे। महर्षि थे। आश्चलायन जैसे ही महर्षि थे।
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विवेकानंद देवेद्रनाथ के पास जाकर भी सही पूछ रहे थे-ईश्वर है? मगर पूछने का ढंग ऐसा था कि ज्ञानी घबड़ा गया। विवेकानंद के कोट का कालर पकड़ कर ,हिलाकर पूछा-ईश्वर है? झिझक गये देवेंद्रनाथ। कहा कि बैठो। आहिस्ता से बैठो। फिर मैं बताऊं। लेकिन विवेकानंद ने कहा- आपकी झिझक ने सब कुछ कह दिया। आप झिझक गये, आपका उत्तर एक झिझक से आ रहा है। आपको पता नहीं है। जानते होंगे आप बहुत कुछ उसके संबंध में, उसे नहीं जाना है। ईश्वर है या नहीं, ये सवाल उचित नहीं…तुम हो या नहीं। इसकी खोज करो..जब ये खोज पूरी हो जाए तो ईश्वर की खोज करेंगे।