धर्म

सत्यार्थप्रकाश के अंश—33

यह सिद्ध बात है कि पांच सहस्त्र वर्षो वेदमत से भिन्न दूसरा कोई भी मत न था क्योंकि वेदोक्त सब बातें विद्या से अविरूद्ध हैं। वेदों की अप्रवृत्ति होने का कारण महाभारत युद्ध हुआ। इन की अप्रवृत्ति से अविद्या अन्धकार के भूगोल में विस्तृत होने से मनुष्यों की बुद्धि भ्रमयुक्त होकर जिस के मन में जैसा आया वैता मत चलाया। उन सब मतों में चार मत अर्थात् जो वेद-विरूद्ध पुराणी,जैनी,किरानी और कुरानी सब मतों के मूल हैं वे क्रम से एक के पीछे दूसरा तीसरा, चौथा चला है। अब इन चारों की शाखा एक सहस्त्र से कम नहीं है। इन सब मतवादियों,इन के चेलों और अन्य सब को परस्पर सत्यासत्य के विचार करने में अधिक परिश्रम न हो इसलिए यह ग्रन्थ बनाया है। नौकरी की तलाश है..तो जीवन आधार बिजनेस प्रबंध बने और 3300 रुपए से लेकर 70 हजार 900 रुपए मासिक की नौकरी पाए..अधिक जानकारी के लिए यहां क्लिक करे।
जो-जो इस में सत्य मत का मण्डन और असत्य मत का खण्डन लिखा है वह सब को जानना ही प्रयोजन समझा गया है। इस में जैसी मेरी बुद्धि जितनी विद्या और जितना इन चारों मतों के मूल ग्रन्थ देखने से बोध हुआ है उस को सब के आगे निवेदित कर देना मैंने उत्तम समझा है क्योंकि विज्ञान गुप्त हुए का पुर्नमिलना सहज नहीं हे। पक्षपात छोडकर इस को देखने से सत्यासत्य मत सब को विदित हो जायेगा। पश्चात् सब को अपनी-अपनी समझ के अनुसार सत्यमत का ग्रहण करना और असत्य मत को छोडऩा सहज होगा। इन में से जो पुराणादि ग्रन्थों से शाखा शाखान्तर रूप मत आय्र्यावत्र्त देश में चले हैं उन का सक्षेंप से गुण दोष 11 वे समुल्लाय में दिखलाया जाता है।इस मेरे कर्म से यदि उपकान न माने तो विरोध भी न करें। क्योंकि मेरा तात्पर्य किसी की हानि वा विरोध करने में किन्तु सत्यासत्य का निर्णय करने कराने का है।
इसी प्रकार सब मनुष्यों को न्यायदृष्टि से वर्तना अति उचित है। मनुष्यजन्म का होना सत्यासत्य का निर्णय करने कराने के लिये हैं ,न कि वाद विवाद विरोध करने कराने के लिये। इसी मतामतान्तर के विवाद से जगत् में जो-जो अनिष्ट फल हुए,होते हैं और आगे होंगे उन को परस्पर मिथ्या मतमतान्तर का विरूद्ध वाद न छूटेगा तब तक अन्योयन्य को आनन्द न होगा। यदि हम सब मनुष्य और विशेष विद्वज्जन ईष्र्या द्वेष छोड़ सत्याइसत्य का निणर्य करके सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना कराना चाहैं तो हमारे लिये यह बात असाध्य नहीं है।
यह निश्चय है कि इन विद्वानों के विरोध ही ने सब का विरोध-जाल में फंसा रखा है। यदि ये लोग अपने प्रयोजन में न फंस कर सब के प्रयोजन को सिद्ध करना चाहैं तो अभी ऐक्यमत हो जायें। इस के होने की युक्ति इस की पूर्ति में लिखेंगे। सर्वशक्तिमान् परमात्मा एक मत में प्रवृत्त होने का उत्साह सब मनुष्यों के आत्माओं में प्रकासित करे।
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