धर्म

सत्यार्थप्रकाश के अंश—44

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साकार में मन स्थिर कभी नहीं हो सकता क्योंकि उस को मन झट ग्रहण करके उसी के एक-एक अवयव में घूमता और दूसरे में दौड़ जाता है। और निराकार अनन्त परमात्मा के ग्रहण में यावत्सामथ्र्य मन अत्यन्त दौड़ता है तो भी अन्त नहीं पाता। निरवयव होने से चंचल भी नहीं रहता किन्तु उसी के गुण,कर्म स्वभाव, का विचार करता -करता आनन्द में मग्र होकर स्थिर हो जाता है। और जो साकार में स्थिर होता तो सब जगत् का मन स्थिर हो जाता क्योंकि जगत् में मनुष्य, स्त्री ,पुत्र, धन,मित्र आदि साकार में फंसा रहता है परन्तु किसी का उस में मन स्थिर हो जाता है। इसलिए मूर्तिपूजा करना अधर्म है।
दूसरा-उस में करोड़ो रूपये मन्दिरों में व्यय करके दरिद्र होते हैं और उस में प्रमाद होता है। तीसरा-स्त्री पुरूषों का मन्दिरों में मेला होने से व्यभिचार,लड़ाई, बखेड़ा और रोगादि उत्पन्न होते हैं। चौथा- उसी का धर्म,अर्थ, काम और मुक्ति का साधन मानके पुरूषार्थ रहित होकर मनुष्यजन्म व्यर्थ गमाता है। पांचवा- नाना प्रकार की विरूद्धस्वरूप नाम चरित्रयुक्त मूर्तियों के पुजारियों का ऐक्तमत नष्ट होके विरूद्धमत में चल कर आपस में फूट बढ़ा के देश का नाश करते हैं। छठा- उसी के भरोसे में शत्रु का पराजय और अपना विजय मान बैठे रहते हैं। उन का पराजय हो कर राज्य, स्वातन्त्र्य और धन का सुख उनके शत्रुओं के स्वाधीन होता है और आम पराधीन भठियारे के टट्टू और कुम्हार के गदहे के समान शत्रुओं के वश में होकर अनेकविधि दु:ख पाते हैं। सातवां- जब कोई किसी को कहे कि हम तेरे बैठने के आसन वा नाम पर पत्थर धरें तो जैसे वह उस पर क्रोधित होकर मारता वा गाली प्रदान देता है वैस ही परमेश्वर की उपासना के स्थान हृदय और नाम पर पाषाणादि मूर्तियां धरते हैं उन दुष्टबुद्धिवालों का सत्यानाश परमेश्वर क्यों न करे? आठवां- भ्रान्त होकर मन्दिर-मन्दिर देशदेशान्तर में घूमते -घूमते दु:ख पाते ,धर्म,संसार और परमार्थ का काम नष्ट करते,चोर आदि से पीडि़त होते ठगो से ठगाते रहते हंै।
नववां- दुष्ट पूजारियों को धन देते है वे उस धन को वेश्या,परस्त्रीगमन,मद्य,मांसाहार,लड़ाई बखेडो में व्यय करते हैं जिस से दाता का सुख का मूल नष्ट होकर दुख होता है। दसवां- माता पिता आदि माननीयों का अपमान कर पाषाणादि मूर्तियों का मान करके कृतघ्र हो जाते हैं। ग्यारहवां- उन मूर्तियों को कोई तोड़ डालता वा चोर ले जाता है तब हा-हा करके रोते रहते हैं। बाहरवां- पूजारी परिस्त्रियों के संग और पूजारिन परपुरूषों के संग से प्राय: दूषित होकर स्त्री पुरूष के प्रेम के आनन्द को हाथ से खो बैठते हैं- तेहरवां-स्वामी सेवक आज्ञा का पाल अर्थात् यथावत् न होने से परस्पर विरूद्धभाव होकर भ्रष्ट हो जाते हैं।
चौदहवां- जड़ का ध्यान करने वाले का आत्मा भी जड़ बुद्धि हो जाता है क्योंकि ध्येय का जड़त्व धर्म अन्त:करण द्वारा आत्मा में अवश्य आता है। पन्द्रहवां- परमेश्वर ने सुगन्धियुक्त पुष्पादि पदार्थ वायु जल दुर्गन्ध निवारण और अरोग्यता के लिए बनाये हैं। उन को पुजारी जी तोड़ताड़ कर न जाने उन पुष्पों की कितने दिन तक सुगन्धि आकाश में चढ़ कर वायु जल की शुद्धि करता और पूर्ण सुगन्धि के समय तक उस का सुगन्ध होता है, उस का नाश मध्य में ही कर देते हैं। पुष्पादि कीच के सााि मिल सड़ कर उलटा दुर्गन्ध उत्पन्न करते हैं। क्या परमात्मा ने पत्थर पर चढ़ाने के लिए पुष्पादि सुगन्धियुक्त पदार्थ रचे हैं। सेलहवां- पत्थर पर चढ़े हुए, पुष्प,चन्दन, और अक्षत आदि सब का जल और मृतिका के संयोग होने से मोरी वा कुण्ड में आकर सड़ के इतना उस से दुर्गन्ध आकाश में चढ़ता है कि जितना मनुष्य के मल का। और सहस्त्रों जीव उस में पड़ते इसलिये सर्वथा पाषाणादि मूर्तिपूजा सज्जन लोगो का त्यक्तव्य है। और जिन्होंने पाषाणमय मूर्ति की पूजा की है करते हैं, और करेंगे। वे पूर्वोक्त दोषों से न बचे, न बचते हैं, और न बचेंगे।
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