हिसार

लुवास में स्वनिर्मित इंडोस्कोपिक कैमरे की सहायता से शुरू हुआ उपचार, स्मार्टफोन से हो सकेगी अटैच

हिसार के वैज्ञानिकों ने की श्वास नली या खाने की नली में रूकावट के इलाज के लिए सस्ती तकनीक की खोज

हिसार,
लुवास के वैज्ञानिक डॉ रामनजर चौधरी ने श्वास नली या खाने की नली में किसी प्रकार के रोग के डायग्नोसिस के लिए बहुत ही सस्ती तकनीक की खोज की है। ये तकनीक बहुत ही सरल व उपयोगी है। इसका प्रयोग फील्ड के डॉक्टर भी बड़ी ही आसानी से कर सकते है।
लुवास वैज्ञानिकों के अनुसार पारम्परिक इंडोस्कोपिक यूनिट काफी महंगी व जटिल बनावट की होती है, जिसका अनुमानित लागत करीब 50 लाख रुपये है। इसको फील्ड में गांव-गांव ले जाना भी मुश्किल है एवं इसके उपयोग के लिए बिजली का होना अर्निवार्य होता है। इसका संचालन करने के लिये एक कुशल इंडोस्कोपी प्रशिक्षित डॉक्टर की आवश्यकता होती है। साथ ही उपयोग के दौरान पशु द्वारा मशीन को हानि पहुंचाने की संभावना काफी ज्यादा है। लुवास द्वारा स्वनिर्मित इंडोस्कोपिक यूनिट को बनाने की कीमत मात्र 1500 रुपये है। इसको किसी भी स्मार्टफ़ोन के साथ जोड़ कर चलाया जा सकता है। हालांकि इसमें सुधार की अभी और गुंजाइस है परन्तु लुवास द्वारा इसको नाक, मुंह, खाने एवं श्वास की नली के विभिन बीमारियों के पहचान के लिए उपयोग में लाया जा रहा है। इसको जलरोधी कैमरे को आवश्यकतानुसार संशोधन करके बनाया गया है। इससे प्राप्त जानकारी (चित्र एवं फिल्म) को संचय करने की भी सुविधा है। डॉ. चौधरी के इस खोज को रिसर्च रिव्यु कमेटी के सामने भी प्रस्तुत किया जा चुका है, जिसे डायरेक्टर ऑफ रिसर्च ने काफी सराहा। इसके परीक्षण में डॉ. सतबीर, डा. संदीप गोयल एवं डॉ. रामनिवास का भी सराहनीय योगदान रहा।
आज इस यूनिट का इस्तेमाल करके भैंस की नाक में ग्रेन्युलोमा नामक बीमारी का आसानी से पता लगा कर इसका इलाज शुरू किया है। इस बीमारी के कारण भैंस के नाक से कई दिनों से खून बह रहा था व बीमारी नाक के अंदरूनी हिस्से में होने के कारण, खून स्त्रोत का पता ही नहीं चल रहा था। इससे पहले भी कई पशुओं में इसका सफल प्रयोग किया जा चुका है। ये तकनीक बहुत सस्ती है और फील्ड में भी इसे आसानी से लागू किया जा सकता है। इसके प्रयोग से हरियाणा के पशुपालकों को काफी फायदा पहुचेगा और शीघ्र ही लुवास विश्वविद्यालय इस इंडोस्कोपिक यूनिट के प्रशिक्षण की व्यवस्था हरियाणा के वेटरनरी सर्जनों के लिए करेगा ताकि वो फील्ड में इसका सुचारू रूप से इस्तेमाल कर सकें।

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Jeewan Aadhar Editor Desk