धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—226

एक बार नरकासुर ने बलि देने के उद्देश्य से 1600 कन्याओं को बंदी बनाकर एक कारागार में डाल रखा था। कारागार में बंद कन्याओं ने श्रीकृष्ण की उपासना करना आरंभ कर दी।

तब भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर से सभी कन्याओं को कैद से मुक्त करने को कहा। लेकिन बल के अभिमान में चूर नरकासुर ने श्रीकृष्ण को युद्ध के ललकारा। श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया और उन सभी कन्याओं को कैद से मुक्त कराया। जब वह सभी अपने घर पहुंची तो उनके परिवार वालों ने उन्हें अपनाने से मना कर दिया। जब इन कन्याओं के परिवारजनों ने इन्हें लोक-लाज के भय से अपनाने से मना कर दिया। ऐसे में वे सभी पुन: श्रीकृष्ण की शरण में पहुंची।

उन्होंने अपनी व्यथा सुनाते हुए श्रीकृष्ण को कहा कि नरकासुर की बंदी होने के कारण सभी उन्हें तुच्छ दृष्टि से देख रहे है। उनके परिजन भी उनको अपनाने को तैयार नहीं है। ऐसे में उनका जीवन कैद से मुक्त होने के बाद भी नरकीय हो गया है। तब श्री कृष्ण ने 16 हजार रूपों में प्रकट होकर एक साथ उनसे विवाह रचाया ताकि समाज में उनको उचित मान—सम्मान मिल सके।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, भगवान श्रीकृष्ण की यह लीला न केवल प्रत्येक नारी के मान—सम्मान की रक्षा करने की प्रेरणा देती है बल्कि संदेश भी देती है कि भगवान अपने भक्तों के लिए अपने सभी नियमों को ताक पर रखकर भक्त की रक्षा करते हैं। इसलिए जब भी संकट में स्वयं को पाओं तो स्वयं को प्रभु के प्रति समर्पित कर दीजिए।

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