धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 693

एक नगर में एक युवा व्यापारी था — आरव। वह आधुनिक सोच वाला, टेक्नोलॉजी में आगे और हर चीज़ को “प्रॉफिट-लॉस” के तराजू में तोलने वाला व्यक्ति था। एक दिन उसके पिता ने कहा — “बेटा, आज धनतेरस है, चलो दीपक जलाएं, लक्ष्मी जी की पूजा करें।”

आरव मुस्कराया — “पापा, यह सब पुराने ज़माने की बातें हैं। आज के युग में पूजा-पाठ से धन नहीं बढ़ता, बल्कि मेहनत और मार्केटिंग से बढ़ता है।”

पिता कुछ नहीं बोले, बस मुस्करा कर बोले — “ठीक है, आज पूजा की जगह चलो मेरे साथ गोदाम में चलते हैं।”

वे दोनों गए। पिता ने पुराने रजिस्टर निकाले और कहा — “बेटा, देखो यह वही दिन था जब तुम्हारे दादा ने पहली बार अपना व्यापार शुरू किया था। उस दिन उन्होंने सिर्फ़ सोना नहीं खरीदा था, बल्कि ईमानदारी, शुभारंभ और विश्वास खरीदा था। यही उनकी असली धनतेरस थी।”

आरव चुप हो गया। पिता आगे बोले — “धनतेरस केवल सोना या बर्तन खरीदने का दिन नहीं है। यह दिन याद दिलाता है कि धन का सच्चा अर्थ क्या है — ईमानदारी से कमाया धन, स्वास्थ्य का धन, और दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाने का धन।”

आरव बोला — “लेकिन आज के युग में तो लोग डिस्काउंट, EMI और ऑफर के पीछे भागते हैं।”

पिता मुस्कराए — “सही कहा, पर धनतेरस हमें याद दिलाता है कि खरीदारी से ज्यादा जरूरी है कृतज्ञता। आज हम जो भी छोटा-बड़ा कार्य शुरू करें, उसे शुभ संकल्प और अच्छे विचारों के साथ आरंभ करें — यही आधुनिक धनतेरस का अर्थ है।”

आरव ने उस दिन पहली बार दीपक जलाया, पर इस बार केवल मिट्टी का नहीं — मन का भी दीपक जल उठा। उसने अपने स्टाफ को बोनस दिया, जरूरतमंदों को दान किया, और अपने ऑफिस में सबके साथ प्रसाद बांटा।

तब पिता बोले — “यही है असली धनतेरस — जब तुम्हारा धन सिर्फ़ तिजोरी नहीं भरता, बल्कि किसी के चेहरे पर मुस्कान लाता है।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “आधुनिक युग में धनतेरस का अर्थ केवल खरीदना नहीं, उदारता से देना और अपने जीवन में शुभता का दीप जलाना है। जब मन में करुणा, कर्म में ईमानदारी और विचारों में प्रकाश हो — वही सच्ची धनतेरस है।”

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