धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—724

हिमालय की शांत घाटी में एक सुप्रसिद्ध आश्रम था। वहाँ एक वृद्ध संत—स्वामी निर्भरानंद—रहते थे। उनके पास दूर-दूर से लोग आते थे। कहा जाता था कि वे समय का रहस्य जानते हैं—कैसे मनुष्य समय के जाल में उलझकर स्वयं से दूर हो जाता है।

एक दिन एक युवक आया—रूप से तेजस्वी, पर भीतर से टूटा हुआ।

वह बोला— “गुरुदेव! मैं दिन भर उलझन में रहता हूँ। कभी भूतकाल के दुख याद आते हैं, कभी भविष्य की चिंताएँ मुझे खा जाती हैं। मन कभी शांत नहीं होता। कृपा कर मार्ग बताइए।”

संत ने उसे कुछ देर तक शांत भाव से देखा। फिर बोले—“आज मैं तुम्हें जीवन का वह सत्य बताऊँगा, जिसे जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। चलो, मेरे साथ जंगल की ओर।”

दोनों घने जंगल में पहुँचे। रास्ते में पड़े एक विशाल पत्थर की ओर इशारा कर संत बोले—
“इसे उठाओ।” युवक ने पूरी ताकत लगाई, पर पत्थर न हिला।

हांफकर बोला— “गुरुदेव, ये असंभव है।”

संत मुस्कुराए— “यही तो भूतकाल है। भूतकाल भी ऐसे ही भारी पत्थर की तरह है—इसे उठाने की कोशिश करते रहोगे, पर यह उठेगा नहीं, बस तुम्हें थकाएगा। फिर भी लोग पूरे जीवन इसे उठाने की कोशिश में अपनी ऊर्जा नष्ट कर देते हैं।” युवक चुप हो गया। उसके भीतर जैसे कोई गाँठ खुल रही थी।

आगे वे एक सुंदर झील के पास पहुँचे। झील का पानी बिल्कुल साफ था।
संत ने कहा— “इस झील में अपना भविष्य देखो।” युवक ने झील में झाँका। लहरें थीं… प्रतिबिंब टूट-सा रहा था… कुछ स्पष्ट नहीं दिख रहा।

वह बोला— “गुरुदेव, कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा।”

संत ने कहा— “भविष्य इसी झील की तरह है। जब-जब तुम इसे जानने की कोशिश करोगे, लहरें उठेंगी और तुम्हें भ्रम मिलेगा। भविष्य को पकड़ने की कोशिश करना ऐसा ही है जैसे पानी की मुट्ठी भरना—छलनी हाथ में से बह जाता है।”

युवक ने सिर झुका लिया। अब उसके मन में एक ही प्रश्न था— “तो फिर जीवन कहाँ है?”

संत ने उसे पास के एक छोटे से कुटीर में ले जाकर एक दीपक जलाया। दीपक की लौ शांत थी—न न तेज, न न बुझने को।

संत बोले— “यह दीपक केवल ‘अभी’ जल रहा है। न भूतकाल इसे छू सकता है, न भविष्य इसे बदल सकता है। इसी क्षण में प्रकाश है, इसी क्षण में जीवन है।”

फिर संत ने युवक को एक कागज़ दिया। उस पर लिखा था—
“भूतकाल: समाप्त
भविष्य: अनिश्चित
वर्तमान: उपलब्ध”

संत ने कहा—“जब तक तुम समाप्त चीज़ पर पछताते रहोगे या अनिश्चित चीज़ से डरते रहोगे,
तब तक उपलब्ध जीवन से वंचित रहोगे।
जो व्यक्ति वर्तमान में जीता है, उसे वही मिलता है जो सब खोजते हैं—शांति, ऊर्जा, आनंद और सफलता।”

युवक ने पूछा—“गुरुदेव, वर्तमान में कैसे रहा जाए?”

संत बोले— “बहुत सरल— अपने हर कार्य में पूर्ण मन से लगाकर। जब खाओ तो सिर्फ खाना खाओ, जब काम करो तो सिर्फ काम करो, जब प्रार्थना करो तो सिर्फ प्रार्थना करो। हर क्षण में एक ही काम, पूरे मन से— यही वर्तमान का रहस्य है।”

युवक की आँखों में आँसू आ गए।

वह बोला— “गुरुदेव, आज समझ आया कि मैं जीवन को ढूँढ रहा था, जबकि जीवन तो यहीं था—मेरी साँसों में, इस क्षण में।”

संत ने आशीर्वाद देते हुए कहा—“याद रखना—जो वर्तमान में जीता है, वह कभी हारता नहीं।
वर्तमान ही वह एकमात्र स्थान है जहाँ परमात्मा तुम्हें मिल सकता है।”

और उस दिन से युवक का जीवन बदल गया। भूतकाल का पत्थर गिर गया,भविष्य की लहरें शांत हो गईं,और वर्तमान का दीपक उसके भीतर जीवनभर जलता रहा।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, यही है जीवन का सत्य— जीवन न कल में है, न आने वाले कल में, जीवन बस ‘इस क्षण’ में है।

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