बहुत समय पहले की बात है। एक पर्वतीय क्षेत्र में एक आश्रम था, जहाँ एक अनुभवी संत रहते थे। दूर–दूर से लोग उनके पास मार्गदर्शन लेने आते थे। संत का एक ही सिद्धांत था—जीवन में जो समय को पहचान लेता है, वही जीवन को जीत लेता है।
उसी क्षेत्र में केशव नाम का एक युवक रहता था। वह बुद्धिमान था, पर निर्णय लेने में अत्यधिक विलंब करता था। हर अवसर को वह सोच–विचार में गँवा देता—कभी डर के कारण, कभी असफलता की आशंका में। वह हमेशा कहता, “अभी नहीं… थोड़ा और सही समय आने दूँ।”
एक दिन केशव संत के पास पहुँचा और बोला, “गुरुदेव, मैं मेहनत करता हूँ, सपने भी देखता हूँ, फिर भी जीवन में आगे नहीं बढ़ पा रहा।”
संत ने उसे अगले दिन प्रातः पहाड़ की चोटी पर आने को कहा। अगली सुबह सूर्योदय से पहले दोनों पहाड़ की चोटी पर पहुँचे। नीचे घाटी धुँध से ढकी थी। संत ने कहा, “ध्यान से देखो, सूरज निकलते ही यह धुँध हट जाएगी और रास्ता स्पष्ट दिखेगा।”
कुछ ही क्षणों में सूर्य निकला। धुँध छँटने लगी और एक सँकरा मार्ग दिखाई दिया जो घाटी के पार जाता था। संत बोले, “यह मार्ग केवल थोड़ी देर के लिए दिखता है। जैसे ही सूरज ऊपर आएगा, तेज रोशनी में यह रास्ता फिर ओझल हो जाएगा।”
केशव बोला, “तो हमें तुरंत चलना चाहिए।”
संत मुस्कराए, “हाँ, यही जीवन का सत्य है।”
लेकिन केशव फिर सोच में पड़ गया—अगर रास्ता कठिन हुआ तो? अगर गिर गए तो?
तभी सूरज और ऊपर चढ़ गया और रास्ता दिखाई देना बंद हो गया।
संत ने गंभीर स्वर में कहा, “देखा केशव, अवसर हमेशा आवाज़ नहीं लगाते। वे संकेत देते हैं। जो संकेत समझ लेता है, वही आगे बढ़ता है।”
केशव को अपने जीवन की सारी चूकी हुई संभावनाएँ याद आने लगीं—पढ़ाई, व्यापार, रिश्ते—सबमें उसने सही समय को पहचाना, पर कदम नहीं उठाया।
उसकी आँखें भर आईं। उसने संत के चरणों में सिर झुका कर कहा, “गुरुदेव, अब समझ आया कि मेरा सबसे बड़ा दोष आलस या अज्ञान नहीं, बल्कि निर्णय की कमी थी।”
संत ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, “याद रखो, निर्णय पूर्ण होने पर नहीं, उपयुक्त समय पर लेना होता है। जो समय पर जोखिम नहीं उठाता, वह जीवन भर सुरक्षित रहकर भी असफल रह जाता है।”
उस दिन के बाद केशव ने नियम बना लिया— सोचना है, लेकिन टालना नहीं है।
धीरे–धीरे उसका आत्मविश्वास बढ़ा, अवसरों का सही उपयोग हुआ और वह अपने लक्ष्य के मार्ग पर आगे बढ़ने लगा।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “अवसर सूर्योदय की तरह होते हैं—जो जाग गया, वही प्रकाश पाया। जो देर से उठा, उसके लिए दिन होते हुए भी अंधेरा रह गया।” यदि हम समय पर अवसर पहचानकर लाभ नहीं उठाते, तो दोष परिस्थितियों का नहीं, हमारे निर्णय का होता है। समय चुपचाप निकल जाता है, और लक्ष्य हमसे दूर हो जाता है।








