एक प्रसिद्ध संत थे। उनके आश्रम में एक वृद्ध सेवक रहता था, जो बीस वर्षों से संत के साथ हर काम करता था— प्रातः आरती से लेकर रात्रि की साधना तक। संत के वस्त्र, जल, भोजन, अतिथियों की व्यवस्था—सब वही संभालता।
एक दिन वह सेवक बीमार पड़ा और कुछ ही समय में देह त्याग गया। उस दिन संत ने आश्रम में घंटा नहीं बजाया। शिष्य चिंतित हो गए।
एक ने पूछा— “गुरुदेव, क्या आज साधना नहीं होगी?”
संत मुस्कराए और बोले— “क्यों नहीं होगी? क्या सेवा किसी एक शरीर पर निर्भर थी?”
फिर संत शिष्यों को पास ले गए। वहाँ एक दीपक जल रहा था।
संत ने कहा— “जब यह दीप बुझता है, तो दूसरा दीप जलाया जाता है। अंधकार के आगे संसार झुकता नहीं।”
फिर उन्होंने एक कथा सुनाई— एक किसान की बैल की जोड़ी में से एक बैल मर गया।
किसान कई दिन खेत नहीं गया। फसल सूखने लगी।
बूढ़े पिता ने कहा— “बैल गया है, खेती नहीं। यदि तू रुका रहेगा, तो भूख भी आएगी।”
किसान ने नया बैल लिया, हल फिर चला। कुछ समय बाद उसने समझा— कष्ट आया था, पर कर्म रुकना नहीं चाहिए था।
संत बोले— “नदी रास्ते में चट्टान पाती है, वह रोती नहीं, रुकती नहीं— वह रास्ता बदल लेती है।”
यदि नदी यह कह दे कि चट्टान है इसलिए मैं बहूँगी नहीं, तो गाँव-गाँव सूखे पड़ जाएँ।
एक विद्यार्थी अपने प्रिय शिक्षक के स्थानांतरण पर टूट गया। उसने पढ़ाई छोड़ दी। पर परीक्षा आई—वह नहीं रुकी। समय आगे बढ़ता रहा।
बाद में उसे समझ आया— शिक्षक मार्ग दिखाते हैं, पर चलना स्वयं को ही होता है।
संत ने कहा— “किसी के बिना न ज़िंदगी रुकती है, न ही कोई काम। जो व्यक्ति हमें छोड़ जाता है, वह हमें दुर्बल नहीं, आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा देता है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, दुख होना स्वाभाविक है। रुक जाना दुर्बलता है, चलना ही साधना है। जीवन का नियम है— चलते रहो, क्योंकि समय किसी के लिए नहीं ठहरता।








