एक गांव में एक ग्वाला रोज सुबह अपनी गायों को लेकर जंगल में चराने जाता और शाम को वापस लौट आता था। उसी जंगल में एक संत का आश्रम था। संत दिन-रात तप, ध्यान और मंत्र जाप में लीन रहते थे। ग्वाला भोला-भाला था, वह रोज संत को देखता, लेकिन उसकी समझ में यह नहीं आता था कि संत ऐसा क्यों करते हैं।
एक दिन जिज्ञासा के कारण ग्वाला आश्रम पहुंचा और संत से पूछ बैठा, “महाराज, आप रोज ये सब क्यों करते हैं?” संत ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “मैं भगवान को पाने के लिए भक्ति करता हूं। तप, ध्यान और पूजा से भगवान के दर्शन होते हैं।”
ग्वाले के मन में भी भगवान को देखने की इच्छा जाग उठी। उसने सोचा कि अगर संत ऐसा करके भगवान को पा सकते हैं, तो वह भी कोशिश करेगा। वह जंगल में एक शांत स्थान पर गया, एक पेड़ के नीचे खड़ा हो गया और एक पैर पर तप करने लगा। उसने इतना कठोर संकल्प लिया कि सांस लेना भी धीमा कर दिया और मन ही मन निश्चय किया कि जब तक भगवान के दर्शन नहीं होंगे, वह ऐसे ही रहेगा।
उसकी सच्ची लगन और कठोर तपस्या से भगवान प्रसन्न हो गए और तुरंत उसके सामने प्रकट हो गए। उन्होंने कहा, “पुत्र, आंखें खोलो, मैं तुम्हारे सामने हूं।” ग्वाले ने बिना आंखें खोले पूछा, “आप कौन हैं?” भगवान ने उत्तर दिया, “मैं वही ईश्वर हूं, जिनके दर्शन के लिए तुम तप कर रहे हो।”
ग्वाले ने आंखें खोलीं, लेकिन उसने कभी भगवान को देखा नहीं था, इसलिए उसे संदेह हुआ। सच्चाई जानने के लिए उसने भगवान को रस्सी से पेड़ के साथ बांध दिया और संत को बुलाने दौड़ पड़ा।
जब संत वहां पहुंचे, तो उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दिया। ग्वाले ने आश्चर्य से भगवान से पूछा कि संत को आप क्यों नहीं दिख रहे। भगवान ने कहा, “मैं केवल उन्हीं को दिखाई देता हूं जो निस्वार्थ भाव से मेरी भक्ति करते हैं। जिनके मन में स्वार्थ और कपट होता है, वे मुझे नहीं देख सकते।”
इस घटना ने संत को भी आत्ममंथन करने पर मजबूर कर दिया और ग्वाले की सच्ची भक्ति का महत्व संत को भी समझ आ गया।
संत रोज पूजा करते थे, लेकिन उनके अंदर कहीं न कहीं स्वार्थ छिपा था, इसी वजह से उन्हें भगवान ने दर्शन नहीं दिए। यह हमें सिखाता है कि केवल दिखावे के कर्मों से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि सच्चाई और शुद्ध भावना जरूरी है। ग्वाले की भक्ति में कोई स्वार्थ नहीं था। वह केवल भगवान को देखने की सच्ची इच्छा रखता था। धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन में जब हम बिना स्वार्थ के काम करते हैं, तो सफलता और संतुष्टि दोनों मिलती हैं। भक्ति में भी ऐसा ही होता है।








