धर्म

परमहंस स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—8

उत्तानपाद की कथा जीव मात्र की कथा है। एक उत्तानपाद नाम के राजा हुए हैं। उनके दो पत्नियां थी- बड़ी का नाम था सुनिति और छोटी का नाम था था सुरूचि। सुनीति के पुत्र हुआ, नाम रखा- ध्रूव। सुरुचि के पुत्र का नाम रखा -उत्तम।

उत्तानपाद -उत्तान अर्थात ऊपर पाद अर्थात पाँव, जिसके पाँव ऊपर और सिर नीचे होता है, उसको कहतें है उत्तनपाद।

जीव मात्र उत्तानपाद है। माता के गर्भ में रहनेवाले सभी जीव उत्तानपाद हैं। गर्भ में बच्चा नौ मास तक इसी तरह उल्टा शीर्षसन के रूप में रहता है और घोर पीड़ा का अनुभव करता है। हर क्षण परमात्मा से विनती करता हैं, हे प्रभु मुझे गर्भ -योनि से मुक्त कर दिजिए। संसार में जाकर कभी तेरा उपकार नहीं भूलूंगा और तेरा नाम जपकर संकीर्तन आदि सत्कार्य करता रहूंगा और मानव जीवन सफल बनाऊंगा, लेकिन इस संसार में आते ही सब कुछ भूल जाता है और देव-दुर्लभ मानव जीवनरूपी हीरे को कौडियों के बदले गंवा देता है।

जीव मात्र की दो पत्नियाँ होती है सुरूचि-सुनीति। रानी-बुद्धि दो प्रकार की होती हैं। सुनीति-गीता, भागवत, रामायण, सन्त महात्मा, गुरूजन, माता-पिता और सुनीति कहते हैं और सुरूचि- अर्थात् मनुष्य अपनी वासना और इन्द्रियों की इच्छानुसार कार्य करता हैं, तो उसे कहतेे हैं सुरूचि। वह न तो शास्त्र से पूछता हैं, न सन्त से और न ही धर्म से। जो जो इन्द्रियों को अच्छा लगे उसके अनुसार खान-पान ब्रहा्रमुर्हुत में अमृत की वर्षा होती है। प्रात:काल का उठना अमृत, स्नान अमृत, ध्यान अमृत, और दान अमृत। ब्रहा्रमुहुर्त में स्नान, ध्यान, ज्ञान और दान करने वाले रूप से कल्याण होता है।

सुनीति का बेटा आज भी आकाश मंडल में चमक रहा है। क्योंकि उसने गर्भावस्था से ही अपने बेटे को अध्यात्म, धर्म और तप के संस्कार दिए। इन्हीं संस्कारों ने उसे अजर-अमर बना दिया। सभी माताओं को अपनी संतान को अध्यात्मिक संस्कार देने चाहिए ताकि उनका यश भी चारों दिशाओं में फैले।

संतान को व्यसन से दूर रहना मां के संस्कार ही सिखा सकते है। आजकल समाज में आधुनिकता के नाम पर व्यसन का प्रचलन काफी बढ़ा हुआ है। संतान को आधुनिक बनाइए लेकिन संस्कारित आधुनिक। व्सयनता पतन लेकर आती हैं, इससे संतान को दूर रखना मां का फर्ज
है।

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