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ओशो : मित्र भी शत्रु होते हैं

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जयप्रकाश नारायण जैसा विचारशील व्यक्ति भी नाम और यश- उसमें ही बंधा रह जाता है। धन्यवाद भी किस बात का दे रहे हो। इसलिए कि लोगों को मरे नाम और यश को दुनिया के कोनों-कोनों तक फैला दिया है। क्या होगा इससे?
राजनीति की लड़ाई अक्सर सिद्धांतों की लड़ाई नहीं है। सिद्धांत तो सिर्फ आड़ होते हैं। असली लड़ाई तो अंहकारो की लड़ाई है। गहरी लड़ाई तो व्यक्तित्वों की लड़ाई हैं।
यह कुछ कांग्रेस और जनता की लड़ाई कोई सिद्धांतों की लड़ाई नहीं है। यह सिर्फ व्यक्तित्वों की लड़ाई हैं। कौन प्रतिष्ठित होता है। कौन पद पर बैठता है। और इसीलिए दुश्मन तो दुश्मन होते ही हैं राजनीति में, मित्र भी दुश्मन होते हैं। क्योंकि जो पद पर बैठा है, उसके आसपास जो मित्र इक_े होते हैं, वे कोशिश में लगे है कि कब धक्का दे दें। अब जगजीवनराम को मौका मिले, तो मोरारजी को धक्का नहीं देंगे? कि चरणसिंह को मौका मिले, तो धक्का नहीं देंगे? इनको धक्का नहीं देंगे, तो अपनी छाती में
छुरा भुक जाएगा।
वे जो पास खड़े है,वे भी धक्का देने को खड़े हैं। वे देख रहे हैं कि कब जरा कमजोरी का क्षण हो कि दे दो धक्का। राजनीति में शत्रु तो शत्रु होते ही हैं,मित्र भी शत्रु होते हैं।
जयप्रकाश नारायण ने मोरारजी को पद पर बिठाया। लेकिन अभी कुछ दिन पहले भेपाल में किसी ने मोरारजी को पूछा कि हमने सुना है कि अब जयप्रकाश नारायण महात्मा गांधी की अवस्था में पहूंच गए हैं। आप क्या कहते हैं? मोरारजी एकदम कहे: नहीं कोई महात्मा गांधी की अवस्था में कभी नहीं पहुंच सकता। वे अद्वितीय पुरूष थे। फिर जयप्रकाश नारायण ने ऐसा कोई दावा कभी भी नहीं किया हैं।
जरा इसको सूक्ष्म से देखना। जरा ऊपर की धूल को झाडक़र देखना। तुम भीतर बड़े अंगारे पाओगे।
पहली तो बात यह कि मोरारजी को महात्मा गांधी अद्वितीय थे या नहीं- इससे कोई प्रयोजन नहीं है। गांधी अद्वितीय थे, यह बात तो इसलिए कही जा रही है, ताकि जयप्रकाश नारायण को उनकी जगह पर न रखा जाए। अब वस्तुत: जो मोरारजी चाहेंगे कि वे महात्मा गांधी हो गए है-जयप्रकाश कहां बीच में आते हैं।
चीजों को तुम सीधे, देखोगे,तो कभी नहीं समझ पाओगे।

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