एक बार भगवान् श्री कृष्णा वृन्दावन में ग्वाल-बालों के साथ गौएँ चरा रहे थे। उनके साथ खेल रहे थे। दोपहर हुई,भूख लगी तो सबने कहा, कान्हा भूख लगी हैं। कृष्ण ने कहा, देखो मित्रो सभी अपना अपना भोजन यहाँ लाओ और सबको एक स्थान पर एकत्रित कर लो। आज हम सब मिलकर एक साथ भोजन करेंगे। कृष्ण अपना भोजन,जो माता यशोदा ने दिया था, सभी को खिला रहे हैं और उनका रूखा सूखा भोजन स्वयं खा रहे हैं।
कृष्ण ने यह लीला क्यों की?
अमीरी-गरीबी की रेखा को समाप्त करने के लिए ही कृष्ण ने ऐसा किया। गरीबी रामयुग में भी थी कृष्णयुग में थी। यह भेद हमेशा से चला आ रहा है। गरीब और अमीर जीव अपने पूर्व जन्म के कर्मानुसार ही बनते हैं। सुखी और दु:खी होना,मानव की प्रकृति पर निर्भर करता हैं। किसी के पास करोड़ों की सम्पति होते हुए भी सुखी नहीं है और कोई दो वक्त की रोटी खाकर भी मस्त हैं यह मानव की अपनी प्रकृति हैं। सन्तोषी बनो आलसी मत बनो,मेहनत करो। मेहनत करने के बाद जो प्राप्त होता हो,उसी से सन्तुष्ट रहना सीखो तो जीवन आनन्दमय बनेगा और यदि दूसरो के सुखों से ईष्र्या करोगे तो मन दुखी रहेगा। मानव बहुत आगे की सोचता रहता है चिन्ता में डूबा रहता हैं, यही दुख का कारण हैं
जितनी लम्बी बात सोचता ,उतनी आयु छोटी हैं,
लाख कमा,चाहे करोड़ कमा,खानी तो दो रोटी हैं।
यथा लाभ:तथा सन्तोष भक्ति का यह लक्षण है। प्रत्येक स्थिति में परमात्मा का धन्यवाद करो और विनती करो-
सांई इतना दीजिए,जामे कुटुम्ब समाय।
मैं भी भूखा ना रहूं,कोई सन्त न भूखा जाय।।