हिसार

तीज पर विशेष : ना रही मेहंदी की महक, न दिखी झूलों की झलक

आदमपुर (अग्रवाल)
एक समय था जब सावन के शुरू होते ही घर के आंगन में लगे पेड़ पर झूले पड़ जाते थे। महिलाएं गीतों के साथ झूले पर पेंग लगाती थी। विकास की दौड़ में पेड़ गायब होते गए और बहुमंजिला इमारतों के बनने से आंगन का अस्तित्व समाप्त हो गया। ऐसे में सावन के झूले भी इतिहास बनकर हमारी परम्परा से गायब हो रहे हैं। हालांकि जन्माष्टमी पर मंदिरों में भगवान को झूला झुलाने की परंपरा जरूर निभाई जा रही है। अब भी ठेठ ग्रामीण इलाकों में कुछ जगह सीमित क्षेत्र में देखने को मिल रहा है। ग्रामीण एवं कस्बे की महिलाओं के बीच यह बात उस वक्त सामने आई जब तीज उत्सव के बारे में परिचर्चा की गई।

आदमपुर निवासी जाना देवी का कहना है कि पहले और अब के समय में बहुत ही अंतर आ चुका है। बीते दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि सावन माह के लगते ही गांव के जोहड़ किनारों पर के पेड़ों पर झूले डाल दिये जाते थे। सुबह थोड़ा बहुत घर के कार्य में हाथ बंटाकर गांव की लड़कियां सीधे झूलों की ओर दौड़ पड़ती तथा वहां गीतों के साथ झूलों पर पेंग लगाती।

आदमपुर ब्लॉक समिति की चेयरपर्सन सुमित्रा भादू, कृष्णा भाटी, पूर्व पार्षद प्रवीण बैनीवाल, सेवानिवृत बी.ई.ई.ओ. आशा रानी खेत्रपाल, डिम्पल ऐलावादी ने कहा कि पेड़ों पर डलने वाले झूले अब देखने को भी नहीं मिलते। झूले तो अब लगने वाले मेलों में ही देखने को मिलतेे हैं। मेहंदी तो अब विवाह-शादियों में युवतियों के हाथों पर दिखती है। इन्हीं विचारों में खोते हुए शांति देवी ने बताया कि अब झूलों का डालना तो जैसे बीते युग की बात हो गई है। इंद्रावती झूरिया ने बताया कि पहले जहां तीज पर हर जगह पेड़ों पर झूले लगे हुए दिखाई देते थे पर अब तो वे खुद बच्चों के कहने पर तीज से एक-दो दिन पहले झूला लगवा देती हैं।

तीज पर आदमपुर में नही कोई कार्यक्रम
आदमपुर में तीज पर्व पर अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे है जिनमें डांस, मेहंदी प्रतियोगिता, सांस्कृतिक कार्यक्रम, तीज मेला आदि शामिल है। लेकिन इस बार कोई कार्यक्रम नही हुआ। कार्यक्रम न होने के चलते महिलाएं एवं युवतियां कार्यक्रम देखने का तरसती रह गई।

यह है तीज का पौराणिक महत्व
कुटिया हनुमान मंदिर के पंडित भागीरथ शर्मा ने बताया कि श्रावण शुक्ल तृतीया (तीज) के दिन भगवती पार्वती 100 वर्षों की तपस्या-साधना के बाद भगवान शिव से मिली थीं। माना जाता है कि इस दिन मां पार्वती का पूजन विवाहित स्त्री-पुरुष के जीवन में हर्ष प्रदान करता है। यह भी कहा जाता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने राधा संग रास रचाया था। इसलिए दंपति राधा-कृष्ण की भी आराधना करते हैं।

नवविवाहित लड़कियों के लिए है विशेष
नवविवाहित लड़कियों के लिए विवाह के बाद पडऩे वाले पहले सावन के त्यौंहार का विशेष महत्व रहा। इस त्यौंहार पर ससुराल से पीहर पहुंची नवविवाहिता लडक़ी की ससुराल से इस त्यौहार पर सिंधारा भेजा जाता है। नवविवाहिता लडक़ी के ससुराल से वस्त्र, आभूषण, शृंगार का सामान, मेहंदी और मिठाई भेजी जाती है। हरियाली तीज से एक दिन पहले सिंधारा मनाया गया।

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