हिसार

माता-पिता की सेवा ईश्वर सेवा सदृश्य: संत कृष्णानंद

आदमपुर (अग्रवाल)
शिव कॉलोनी स्थित ब्राह्मण धर्मशाला में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन वामन अवतार का झांकियों के साथ वर्णन किया गया। कथावाचक संत गोभक्त कृष्णानंद महाराज ने प्रभु भक्ति के महत्ता को दर्शाते हुए राजा परीक्षित के उद्धार की कथा को विस्तार से बताया। उन्होंने इस दौरान माता-पिता की सेवा को ईश्वर भक्ति के सदृश बताते हुए कहा कि अपने माता-पिता की सेवा सुश्रुषा जो नहीं करता, जो उनका तिरस्कार करता है, उसके पास यदि अकूत धन भी है तो वह व्यर्थ है।

ईश्वर भक्ति से ही इंसान जन्म-मरण के चक्कर से मुक्त होता है। कलयुग में श्रीमद्भागवत की कथा ही मुक्ति का मार्ग है। संत ने इस दौरान संसार की उत्पत्ति का रहस्य बताते हुए कहा कि ईश्वर ने संसार में जीवों के रूप में स्वयं को ही स्थापित किया है। जग के प्रत्येक जीव में ईश्वर का वास है और मृत्यु के पश्चात आत्मा पुन: परमात्मा में ही विलीन हो जाती है। अपनी कथा में दान पुण्य का महत्व बताते हुए पूज्य संत ने कहा कि इंसान को अपने घर के द्वार पर आए याचक को कभी खाली हाथ नहीं लौटाना चाहिए। अपने साथ-साथ अपने बच्चों में भी दान की प्रवृति विकसित करनी चाहिए, ताकि ईश्वर हमें सदैव दान देने लायक रखे। इंसान को संसार में इसी प्रकार रहना चाहिए जैसे जल में कमल का वास होता है। जल में रहकर भी कमल के पत्ते पर जल नहीं ठहरता उसी प्रकार संसार में भी विभिन्न प्रकार के प्रलोभनों से विचलित हुए बिना जीव को संसार मे अपना समय व्यतीत करना चाहिए।

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