हिसार,
केंद्र सरकार द्वारा पिछले दिनों आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को दस फीसदी आरक्षण देने के बाद अब अलग अलग राज्यों में भी उसी आधार पर आरक्षण देने की तैयारी की जा रही है। जो पूरी तरह से असंवैधानिक है। इस आरक्षण पर रोक के लिए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में हिसार के आजाद नगर निवासी राकेश डूंडाडा की ओर से एडवोकेट लाल बहादुर खोवाल व एडवोकेट एसके वर्मा द्वारा रिट दायर की गई है। इस याचिका पर बुधवार को जस्टिस आरके जैन व जस्टिस हरनरेश सिंह गिल की खंडपीठ ने केंद्र व हरियाणा सरकार को 20 मार्च के लिए नोटिस जारी किया गया है।
एडवोकेट लाल बहादुर खोवाल ने बताया कि केंद्र सरकार ने जो दस फीसदी आरक्षण दिया है, उसे इस वर्ग के लिए शैक्षणिक व प्राइवेट संस्थानों में भी लागू किया गया है, जबकि आज तक भी अनुसूचित जाति, जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग को प्राइवेट संस्थानों में आरक्षण नहीं दिया जा रहा है। यह संशोधन गैर कानूनी है, क्योंकि भारतीय संविधान की प्रस्तावना को भारतीय संविधान की आत्मा कहा जाता है, जिसके साथ कोई भी छेडख़ानी नहीं कर सकता। इसलिए अनुच्छेद 15(6) व 16(6) के परिणाम में यह कानून की नजरों में टिक नहीं पाएगा। पहले भी ऐसे संशोधन किए गए थे, जो टिक नहीं पाए थे। एडवोकेट खोवाल ने बताया कि राकेश डूंडाडा की तरफ से दायर की गई की गई रिट में कहा गया है कि अनुसूचित जाति, जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग न केवल आर्थिक रूप से कमजोर हैं, बल्कि अछूत, आदिवासी, सामाजिक व शैक्षणिक रूप से भी पिछड़े हुए हैं। संविधान की प्रस्तावना सभी के लिए सामाजिक न्याय की बात करती है, जिसका मतलब है कि पिछड़ी जातियों को अगड़ा वर्ग के लोगों तक पहुंचाना। अछूत, डिनोटिफाइड, आदिवासी, अशिक्षित, बेरोजगारी, मानव तस्करी, बेगार, पिछड़ों के मंदिर में ना जाने देना, यह सब सामाजिक पिछड़ेपन का कारण है और इन बुराइयों का उपाय संविधान में दिया गया है।
एडवोकेट खोवाल ने बताया कि मंडल कमिशन ने अन्य पिछड़ा वर्ग की संख्या 52 प्रतिशत व एससी एसटी की संख्या 22.5 प्रतिशत बताई थी और मंडल कमिशन ने यह भी कहा था कि अन्य पिछड़ा वर्ग को अनुपात के हिसाब से 52 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए, लेकिन उच्चतम न्यायालय के नौ जजों के इंद्रासाहनी के केस में संवैधनिक बैंच ने 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण न देने का फैसला सुना दिया था। इसी वजह से अन्य पिछड़ा वर्ग को 52 प्रतिशत की बजाए 27 प्रतिशत आरक्षण दिया था। केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार के केस में 13 जजों की संवैधानिक बैंच ने अपने फैसले मेें कहा था कि संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन संविधान की बुनियादी सुविधाओं के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकती। इस संशोधन में सरकार ने आर्थिक कमजोर वर्ग की अलग क्लास बनाई है जो परिकल्पित नहीं है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकार व डायरेक्टिन प्रिंसिपल के अनुसार सरकार न आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की भलाई के लिए मकान अलॉट किए हैं, लोन दिए हैं, फीस माफी की सुविधाएं दी है। वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर ऑटो चालक, टैक्सी ड्राइवर, दैनिक मजदूरी श्रम करने वाले, बोझा ढोने वाले, फेरी लगाने वाले आदि इस आरक्षण का फायदा नहीं उठा जाएंगे, जिनकी कमाई तो सीमांत है। वे उनसे नहीं लड़ सकते, जिनकी आय आठ लाख से कम है और जिनके पास पांच एकड़ जमीन, एक हजार स्क्वेयर फीट या 200 स्क्वेयर फीट का प्लाट, फ्लैट या मकान है। बिना सर्वे करवाए यह आरक्षण दिया गया है, इसलिए इसका लाभ अमीरों को मिलेगा न कि गरीबों को।
खोवाल ने बताया कि रिट में यह भी ग्राउंड लिया गया है कि आर्थिक रूप से कमजोरों को कभी भी भेदभाव, छुआछूत, सामाजिक अन्याय और उत्पीडऩ का सामना नहीं करना पड़ा, जबकि पिछड़ों को इन सबका सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि 80 प्रतिशत राष्ट्रीय धन, राजनीतिक शक्ति, आर्थिक व शिक्षा केवल 20 प्रतिशत अपर रूलिंग क्लास के पास है और इन अपर कास्ट में पांच प्रतिशत भी गरीब नहीं है। जिनके लिए दस प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। यूजीसी ने एक अप्रैल 2018 तक का डेटा दिया है और बताया है कि एससी एसटी और ओबीसी का सरकार के उच्च रैंक के पदों में कम प्रतिनिधित्व है। प्रोफेसर व एसोसिएट प्रोफेसर, सेंट्रल यूनिवर्सिटी में अन्य पिछड़ा वर्ग का जीरो प्रतिशत है, जबकि 95.2 प्रतिशत प्रोफेसर, 92.9 एसोसिएट प्रोफेसर और 66.27 प्रतिशत असिस्टेंट प्रोफेसर सामान्य वर्ग से हैं। कमजोर वर्ग इस फायदे का हकदार है। इसके लिए सरकार ने कोई डेटा एकत्र नहीं किया और न ही स्टेटस पब्लिस किया है। उन्होंने बताया कि गुजरात सरकार ने भी ऐसा किया था, जिस पर अदालत ने रोक लगा दी थी और कहा था कि कोर्ट के फैसले में दखल देने के लिए दुर्भावना पूर्ण किया गया काम है। कमजोर वर्ग का मतलब एससी, एसटी और ओबीसी है, जिसमें आर्थिक कमजोर वर्ग खुद ही अधिनियम के अंदर एक मिथ्या नाम भाम्रक और गलत है और अधिनियम 15(6) व 16(6) व प्रस्तावना के साथ साथ उच्चतम न्यायालय के फैसले के खिलाफ है। खोवाल ने बातया कि रिट पैटीसन में लिखा गया है कि यह संशोधन मौलिक अधिकारों का हनन और इंद्रासाहनी केस व केशवानंद भारती केस के खिलाफ है।