हिसार

बदलाव: दूध के कारोबार में उतरी सात गांवों की महिलाएं, तोड़ा पुरुषों का एकाधिकार

हिसार,
शाहपुर की कमला देवी, चिकनवास की गीता वर्मा हो या फिर गांव जगाण की रामरति या फिर ढंढूर की आशा। गांव व महिलाओं के नाम भले ही अलग हो, मगर इनकी कामयाबी की राह से लेकर मंजिल एक है। जी हां, यहां बात हो रही है राह ग्रुप फाउंडेशन के महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम के तहत स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से स्व-रोजगार व आत्मनिर्भरता की मिसाल बनी ग्रामीण महिलाओं की। कल तक बेरोजगार माने जाने वाली ये महिलाएं वर्तमान में तीन से 12 हजार रुपये आसानी से कमा रही हैं, वो भी महज दिन में दो से तीन घंटे काम करके। राह ग्रुप फाउंडेशन मार्गदर्शन में ये महिलाएं अब सीमित साधनों के साथ महिला सशक्तिकरण की नई इबारत लिख रही हैं।

दूध के कारोबार से जुड़ी महिलाएं।

विरोधी भी साथी बने
इन महिलाओं को उनका कामकाज आरंभ करने से पहले परिवार व समाज की उपेक्षा का सामना करना पड़ा। इन महिलाओं को राह ग्रु्प फाउंडेशन की बैठकों में भेजने के लिए बहुत कम परिवार राजी होते थे। संस्था की ओर से संचालित ब्यूटी पार्लर, बुटिक सेंटर व सेल्फ डिफेंस ट्रेनिंग कार्यक्रमों में भागेदारी बहुत कम होती थी। संस्था ने गांव की जरुरतोंं व उपलब्ध साधनों को देखकर महिलाओं को दूध के कारोबार में उतारने का फैसला किया तो लोगों ने उनका मजाक तक उड़ाया। मजाक के चलते महिलाओं ने संस्था के कार्यक्रमों में आना ही कम कर दिया। मगर राह संस्था के पदाधिकारियों ने हार नहीं मानी। उन्होंने महिलाओं को लगातार इसके लिए प्रेरित किया। करीब एक वर्ष बाद राह ग्रुप की इस मुहिम के सार्थक परिणाम नजर आने लगे हैं। कल तक जो बैंक या व्यवसायी इन महिलाओं को कमजोर समझते थे, आज वे ही इन्हें ऋण या दूसरी सुविधाएं देने की बात कर रहे हैं। साथ ही परिवार के पुरुष इस मुहिम में उनका साथ देने लगे हैं।

पांच से हुई शुरुआत अब कारवां
राह ग्रुप के सामाजिक सरोकार के अंर्तगत महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम के करीब एक वर्ष पहले हिसार-अग्रोहा मार्ग पर स्थित गांव चिकनवास की मात्र पांच महिलाओं ने दूध के कारोबार के माध्यम से स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ाना आरंभ किया। किसी भी अच्छे कार्य की तरह इस अभियान के पहले चरण में महिलाओं को आर्थिक कठिनाई व दूसरे प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ा। मगर इन महिलाओं ने हिम्मत नहीं हारी। चिकनवास गांव की प्रधान गीता देवी के अनुसार राह ग्रुप फाउंडेशन ने उनकी हर समय मदद की, जिससे उनका हौंसला बढ़ता गया। राह ग्रुप के इस अभियान के तहत वर्तमान में गांव चिकनवास, जगाण, ढंढुर, मात्रश्याम, किरतान, लुदास व शाहपुर की दो सौ से अधिक महिलाएं दूध के कारोबार से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से जुड़ी हुई हैं।
दूध का मापतोल करती चिकनवास स्थित स्वयं सहायता समूह की महिलाएं।

सैनिकों के परिवारों तक दूध पहुंचाने की तैयारी
जिले के अलग-अलग गांवों में कार्यरत ये स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं हिसार केंट, बीएसएफ या उसके आस-पास रहने वाले सैनिक परिवारों को दूध उपलब्ध करवाने की तैयारी में है। ताकि सैनिकों को कम कीमत में बढिय़ा दूध व दूध से बने उत्पाद उपलब्ध हो सके। वर्तमान में इन सातों महिला स्वयं सहायता समूहों के पास दस हजार लीटर से अधिक दूध प्रतिदिन एकत्र होता है। जरुरत पडऩे पर यह आंकड़ा बीस हजार भी हो सकता है। महिलाओं के अनुसार सैनिक परिवारों की आवश्यकता के हिसाब से यह मात्रा प्रर्याप्त है।
गांव शाहपुर में दूध संग्रहण केन्द्र पर का शुभारंभ करती महिलाएं।

अगले वर्ष दस गांवों में लागू होगा मॉडल
जिले के सात गांवों में स्वयं सहायता समूह के दुध संग्रहण केन्द्र सफल होने से उत्साहित सामाजिक संस्था राह ग्रुप फाउंडेशन वर्ष 2018 में दस गांवों में ऐसी ही मुहिम चलाने का लक्ष्य रखा है। राह ग्रुप के प्रवक्ता के अनुसार जिले से सभी ब्लॉकों के एक-एक गांवों में इस प्रकार की मुहिम चलाई जाएगी। चयनित गांवों में दस-दस महिलाओंं या युवा केन्द्रों के सदस्यों को क्षेत्र विशेष की जरुरतों के हिसाब से प्रशिक्षण दिलवाकर उनका कारोबार शुरु करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

राह संस्था का महत्वपूर्ण योगदान
जिले के सात की इन महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में राह नामक संस्था का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन महिलाओं का समूह बनाने से लेकर उन्हें बचत करने के लिए प्रोत्साहित करने व उन्हें लेन-देन का तरीका सिखाने का कार्य सामाजिक संस्था राह ने ही किया है। राह संस्था के पदाधिकारियों के अनुसार पहले तो महिलाओं को दूध या अन्य कारोबार के लिए तैयार करना ही बड़ी चुनौती था, फिर आर्थिक संकट ने उनका रास्ता रोका। मगर जैसे ही महिलाओं ने कमान संभाली वैसे ही असफलताएं स्वयं ही सफलताओं में बदल गई। कल तक जो बैंक या व्यवसायी इन महिलाओं को कमजोर समझते थे, आज वे ही इन्हें ऋण या दूसरी सुविधाएं देने की बात कर रहे हैं।

बढ़ा है मान-सम्मान
राह ग्रुप की मुहिम से जुड़ी करीब इन 200 महिलाओं का मानना है कि जब से वे स्वयं सहायता समूह के माध्यम से काम करने लगी है, उनकी न केवल आर्थिक स्थिति सुधरी है, बल्कि गांव में उनका मान सम्मान भी बढ़ा है। पहले जहां उनके परिवार के पुरुष ही उनसे बगैर पूछे बड़े से बड़ा फैसला कर लेते थे, आज बच्चों को स्कूलों में प्रवेश दिलवाने से लेकर कारोबार से संबंधित मुद्दों में उनको तवज्जो मिलने लगी है।
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युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण
राह ग्रुप के चेयरमैन नरेश सेलपाड़ के अनुसार इस दिशा में काम करने में युवाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। प्रत्येक गांव में जहां युवा क्लब कार्यरत हैं। वे इस दिशा में कार्य करके युवा क्लब सामुहिक रुप से धन अर्जित कर सकते हैं। जिसे गांव में शिक्षा के विकास, स्वच्छता या दूसरे कार्यक्रमों की जरुरत के हिसाब से खर्च किया जा सकता है।
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